Tuesday, February 8, 2011

खुद-खुशी


झिझकती सतह पे दो-चार सितारे
कठोर वास्तविकता के छुपे इशारे
शहर में कुओं की कमी है थोड़ी
मौत भी रात अब कहां गुज़ारे|


दर्द का ज़ख्म से अब रिश्ता ना रहा
घूम रहा बदनाम एक शब्द जो कहा
बंद कमरे में राहत टटोलती ज़िंदगी
ढ़ूंढ़ती है छत पर एक कपड़े की जगह|

 

बेज़ुबान पुल से आंकती गहराई
तराशा था जिसे उस ख्वाब की सच्चाई
जिस्म कुछ देर टहल सकता है हवा में
एक आज़ाद पंछी, ना कोई गवाही|


2010

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