Wednesday, July 18, 2012

अरुणिमा

बिखर  जाती  है  जब  दुनिया, तो  वो  गुलदान  में  मुरझाये  फूल  भी  अछे  लगने  लगते  हैं. अरुणिमा  उन  सूखे  फूलों  से  ही  खुशियाँ  बनाना  सीख  गयी  थी. कभी  गौर  से  देखोगे  तो  बाज़ार  में  गजरे  मिलते  हैं  जो  अरुणिमा  ने  बनाये  थे.  लोग  अनदेखा  कर  देते  हैं .  सिमित  सी  खुशियाँ  कोई  नहीं  चाहता. अरुणिमा  एक  अंतहीन  नदी  में  नाव  की  तरह  जी रही  है . और  अब  कई  साल  से  बरसात  भी  ठीक  से  नहीं  हुई . जल  स्तर  पे  निर्भर खुशियाँ  कितने  सूखे  मौसम  बिना  टूटे  रह  सकती  हैं ? मैं  नहीं  जानता . पर  मैंने  उसे  करीब  से  गुज़रते  देखा  है . एक  हंसी  रहती  है  अरुणिमा  के  चेहरे  पर . शायद  उससे  पता  है  कितने  मौसम  बाकी  हैं .

Friday, January 13, 2012

टप्पे

सर्दियों में कम्बल ओढे भी जब ठिठुरते हैं
एक अंगीठी पे हाथ सेकने की आस
कितनी उम्मीद बंधा देती है
वैसे ही जैसे पर्वत पर बर्फ पिघलकर
नदी बनकर उस किनारे तक जाती है
जहॉं से हवा एक नाविक को राह दिखाती है|

मैंने देखा है उसे ऐसी रातों में
अपने आप से बतियाते
नदी किनारे हवा को टप्पे सुनाते|

Tuesday, February 8, 2011

दुनिया


दूर राहों से मुस्कुराते तुम
शब्दों में वापस आ जाओ,
ये भी तो एक दुनिया है

राहों का अंत

रात से हार कर चला था मैं
सोचा था राहों में रोशनी तो होगी
धुंधला सा कहीं सवेरा मिलेगा
कोई किरन बादलों से उभरी तो होगी

सब राहों का अंत हो गया
अब तक गुम वो सवेरा है
सोचा था राहों में रोशनी तो होगी
और यहां मंज़िल पर भी अंधेरा 
है

मैं तेरी शख्सियत

मैं तुझमे हूं, तेरे पास हूं मैं
मैं तेर शख्सियत, तेरी आवाज़ हूं मैं
तेरी मंज़िल का हर प्रयास हूं मैं
मैं अंत हूं, आघाज़ हूं मैं
तेरी जीत का उल्हास हूं मैं
तेरे जश्न का हर साज़ हूं मैं
तेरी चाहत, तेरा नाज़ हूं मैं
मैं खुदा तेरा, तेरी आस हूं 
मैं

नियम


संकरी होती सड़क को स्तब्ध तकता रहा वो
गुज़रते वक्त की हवा पैरों में मिट्टी भरती रही

 

रोज़ की तरह आज भी गंदे पांव लिए घर पहुंचा|


खुमार


खुमार था
बेशुमार था
हम थे और शायद प्यार था..

खुद-खुशी


झिझकती सतह पे दो-चार सितारे
कठोर वास्तविकता के छुपे इशारे
शहर में कुओं की कमी है थोड़ी
मौत भी रात अब कहां गुज़ारे|


दर्द का ज़ख्म से अब रिश्ता ना रहा
घूम रहा बदनाम एक शब्द जो कहा
बंद कमरे में राहत टटोलती ज़िंदगी
ढ़ूंढ़ती है छत पर एक कपड़े की जगह|

 

बेज़ुबान पुल से आंकती गहराई
तराशा था जिसे उस ख्वाब की सच्चाई
जिस्म कुछ देर टहल सकता है हवा में
एक आज़ाद पंछी, ना कोई गवाही|


2010

Monday, February 7, 2011

तमन्ना


शाम की बारिश में संग घूम लें
बूंदों को बटोरें, बादल चूम लें
भीगे-भीगे से लम्हों में झूम लें

 

उछल के ख्वाहिशों के गुच्छे तोड़ लें
आज़माईश है किस्मत तो ज़रा हाथ मरोड़ लें
खुशियों को अपनी साथ-साथ जोड़ लें


रंग-बिरंगे पन्नों से इश्तहार काट लें
खट्टी है ज़िंदगी अचार चाट लें
चलो आज थोड़ा-सा खुमार बांट
लें


..2009

रात के कुछ टूटे तारे

 

उन शब्दों को सहेज रखा है मैंने
तुमने कहे थे मुझसे जो कभी
रात से टूटे तारों को
खाली पन्नों पे उतारा है|


अक्सर यूंही मिल जाते हैं
सिलसिले मेरे हाथों में
बिखरे, कुछ सिमटे, तुम्हारे शब्द
बोलते, कुछ चुप, तुम्हारे शब्द|


तस्वीरों के आईनों में
पुराने कोनों-किनारों पर
कुछ पुराने शब्द मिले
थोड़े मेरे थोड़े तुम्हारे
रात के कुछ टूटे तारे|


काश.. से शुरु तुम्हारी बातें
ना जाने क्यूं फ़िर मिली मुझे
उंगलियों के बीच में जैसे तुम्हारी उंगलियां हों
कागज़ पे परछाई बनाती
सहर की कुछ रश्मियां हों|


..2004-05