बिखर जाती है जब दुनिया, तो वो गुलदान में मुरझाये फूल भी
अछे लगने लगते हैं. अरुणिमा उन सूखे फूलों से ही खुशियाँ बनाना
सीख गयी थी. कभी गौर से देखोगे तो बाज़ार में गजरे मिलते हैं
जो अरुणिमा ने बनाये थे. लोग अनदेखा कर देते हैं . सिमित सी
खुशियाँ कोई नहीं चाहता. अरुणिमा एक अंतहीन नदी में नाव की तरह
जी रही है . और अब कई साल से बरसात भी ठीक से नहीं हुई . जल
स्तर पे निर्भर खुशियाँ कितने सूखे मौसम बिना टूटे रह सकती
हैं ? मैं नहीं जानता . पर मैंने उसे करीब से गुज़रते देखा है . एक
हंसी रहती है अरुणिमा के चेहरे पर . शायद उससे पता है कितने मौसम
बाकी हैं .
Wednesday, July 18, 2012
Friday, January 13, 2012
टप्पे
सर्दियों में कम्बल ओढे भी जब ठिठुरते हैं
एक अंगीठी पे हाथ सेकने की आस
कितनी उम्मीद बंधा देती है
वैसे ही जैसे पर्वत पर बर्फ पिघलकर
नदी बनकर उस किनारे तक जाती है
जहॉं से हवा एक नाविक को राह दिखाती है|
मैंने देखा है उसे ऐसी रातों में
अपने आप से बतियाते
नदी किनारे हवा को टप्पे सुनाते|
एक अंगीठी पे हाथ सेकने की आस
कितनी उम्मीद बंधा देती है
वैसे ही जैसे पर्वत पर बर्फ पिघलकर
नदी बनकर उस किनारे तक जाती है
जहॉं से हवा एक नाविक को राह दिखाती है|
मैंने देखा है उसे ऐसी रातों में
अपने आप से बतियाते
नदी किनारे हवा को टप्पे सुनाते|
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