बिखर जाती है जब दुनिया, तो वो गुलदान में मुरझाये फूल भी
अछे लगने लगते हैं. अरुणिमा उन सूखे फूलों से ही खुशियाँ बनाना
सीख गयी थी. कभी गौर से देखोगे तो बाज़ार में गजरे मिलते हैं
जो अरुणिमा ने बनाये थे. लोग अनदेखा कर देते हैं . सिमित सी
खुशियाँ कोई नहीं चाहता. अरुणिमा एक अंतहीन नदी में नाव की तरह
जी रही है . और अब कई साल से बरसात भी ठीक से नहीं हुई . जल
स्तर पे निर्भर खुशियाँ कितने सूखे मौसम बिना टूटे रह सकती
हैं ? मैं नहीं जानता . पर मैंने उसे करीब से गुज़रते देखा है . एक
हंसी रहती है अरुणिमा के चेहरे पर . शायद उससे पता है कितने मौसम
बाकी हैं .
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