Friday, January 13, 2012

टप्पे

सर्दियों में कम्बल ओढे भी जब ठिठुरते हैं
एक अंगीठी पे हाथ सेकने की आस
कितनी उम्मीद बंधा देती है
वैसे ही जैसे पर्वत पर बर्फ पिघलकर
नदी बनकर उस किनारे तक जाती है
जहॉं से हवा एक नाविक को राह दिखाती है|

मैंने देखा है उसे ऐसी रातों में
अपने आप से बतियाते
नदी किनारे हवा को टप्पे सुनाते|

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